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Ramayan Katha: श्रीराम ने तिनके को बनाया ब्रह्मास्त्र, इंद्र के पुत्र जयंत को मिली ऐसी सजा

Jayant Story In Ramayana
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Ramayan Katha : रामायण में जब भगवान राम चौदह वर्षों के वनवास पर थे तब एक ऐसी घटना हुई थी कि श्रीराम को इंद्र के पुत्र पर बाण चलाना पड़ा था। देवराज इंद्र और उनकी पत्नी शची के पुत्र जयंत के बारे में कई कथाएं देखने को मिलती हैं। वहीं, रामायण में भी उनके बारे में बताया गया है। इसके अनुसार वह अयोध्या के महाराज दशरथ के कूटनीतिक मंत्रियों में से एक थे। अहंकार से भरे जयंत एक बार श्रीराम के बल को अपनी आंखों से देखना चाहते थे। इसी के चलते उन्होंने कुछ ऐसा किया कि भगवान राम को जयंत पर बाण छोड़ना पड़ा। आइए विस्तार से जानें जयंत, श्रीराम और माता सीता की इस कथा के बारे में…

श्री रामचरितमानस में तुलसीदास ने इस प्रसंग का वर्णन किया है। देवराज इंद्र के पुत्र का अहंकार एक समय इतना बढ़ गया था कि वह दुर्भाग्यशाली श्रीराम का बल देखने पहुंच गया।

सीता चरण चोंच हतिभागा। मूढ़ मंद मति कारन कागा॥
चला रुधिर रघुनायक जाना। सीक धनुष सायक संधाना॥

जयंत ने कौवे का रुप धारण किया
14 वर्षों के वनवास के दौरान श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता माता के साथ चित्रकूट में रह रहे थे। इस बीच एक बार माता सीता और श्रीराम अपनी कुटिया से बाहर बैठे हुए थे। उसी वक्त इंद्र पुत्र जयंत ने कौवे का रूप धारण किया और माता सीता के चरणों में जाकर चोंच मारी। देवी सीता ने उसे बार-बार हटाने का प्रयास किया लेकिन वह दुर्भाग्यशाली कौआ तब भी नहीं माना।

श्रीराम ने तिनके को बनाया ब्रह्मास्त्र
चोंच मारने के कारण माता सीता के पैर से रक्त बहने लगा। जब भगवान राम को इस बात का पता चला, तो जयंत का अहंकार दूर करने में उन्होंने जरा भी देरी नहीं की। माता सीता को चोट लगने से अत्यंत धैर्यवान श्रीराम क्रोधित हो गए और उसी समय उन्होंने एक तिनके को धनुष पर रखकर ब्रह्मास्त्र बनाकर कौए पर चला दिया। इसे देखकर जयंत अपनी जान बचाकर वहां से भागने लगा, लेकिन ब्रह्मास्त्र ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। वह तीनों लोकों में दौड़ता रहा और अपने पिता के देव लोक में भी उसे बचाने का साहस किसी के अंदर नहीं था। उस समय नारद मुनि ने इंद्र पुत्र जयंत से कहा कि केवल स्वयं श्रीराम ही तुम्हारे प्राणों की रक्षा कर सकते हैं।

श्रीराम ने ऐसे बचाए जयंत के प्राण
अपनी जान बचाने के लिए जयंत वापस चित्रकूट की कुटिया में श्रीराम के चरणों में जाकर पड़ गया और उनसे अपने अपराध की क्षमा मांगने लगा। जयंत ने कहा कि हे प्रभु आपके अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुता को में मंदबुद्धि समझ न सका। मुझे अपने कर्म का फल मिला है, मेरी रक्षा कीजिए। तब विनम्र स्वभाव के व्यक्तित्व वाले श्रीराम ने उसके प्राण बचाने के लिए अपना कोई अंग देने को कहा। इसके बाद, जयंत के कहने पर ब्रह्मास्त्र ने उनकी दाईं आंख फोड़ दी। अपनी पत्नी सीता की पीड़ा को देखकर धैर्यवान श्रीराम को भी क्रोध आ गया और उन्होंने जयंत का अहंकार तोड़ने के लिए यह कदम उठाया। लेकिन बाद में क्षमा मांगने पर श्रीराम ने जयंत की केवल एक आंख पर प्रहार करके उसे क्षमा कर दिया।

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