Onam 2025: ओणम का पर्व आज अपने आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण दिन में प्रवेश कर चुका है. 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव का आज मुख्य दिन है, जिसे थिरुओणम के नाम से जाना जाता है. यह वह दिन है जब माना जाता है कि राजा महाबलि अपनी प्रजा से मिलने पाताल लोक से धरती पर आते हैं. इस विशेष अवसर पर पूरा केरल उल्लास और परंपराओं में डूबा हुआ है, जहां घर-घर में ओणम साध्य (दावत), लोकनृत्य और पारंपरिक खेलों का आयोजन किया जाता है. ओणम का सबसे बड़ा आकर्षण इसकी पौराणिक कहानी है. मान्यता है कि ओणम के दिन ही असुर राजा महाबलि हर साल अपनी प्रजा की खुशहाली देखने के लिए धरती पर आते हैं. उनके स्वागत में लोग अपने घरों को फूलों की रंगोली (पुक्कलम) से सजाते हैं और घरों के सामने दीपक जलाते हैं. राजा महाबलि के प्रति यह सम्मान केरल की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है. लोग इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं, पारंपरिक परिधान पहनते हैं और घरों में विशेष पूजा करते हैं.
ओणम साध्य: 24 पकवानों का महाभोज
थिरुओणम का सबसे बड़ा आकर्षण ओणम साध्य है. यह 24 से अधिक तरह के शाकाहारी पकवानों से बनी एक भव्य दावत होती है, जिसे केले के पत्ते पर परोसा जाता है. साध्य में अवियल, सांबार, रसम, कई तरह की करी, पचड़ी, खिचड़ी, और विभिन्न प्रकार के अचार शामिल होते हैं. सबसे खास पकवान पायसम (खीर) होता है, जो कई तरह का होता है. हर पकवान का स्वाद और तैयारी अलग होती है. परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर इस स्वादिष्ट भोजन का आनंद लेते हैं, जो इस पर्व की खुशी को कई गुना बढ़ा देता है.
पुलिकली और कथकली से सजेगा उत्सव
ओणम का उत्सव सिर्फ भोजन तक सीमित नहीं है. इस दिन पारंपरिक लोक कलाओं और नृत्यों का भी प्रदर्शन किया जाता है. पुलिकली, जिसे “बाघ नृत्य” भी कहते हैं, ओणम का एक खास आकर्षण है. इसमें कलाकार अपने शरीर पर बाघ की तरह धारियां बनवाकर नाचते हैं. यह नृत्य दर्शकों को खूब आकर्षित करता है. इसके अलावा, कथकली और मोहिनीअट्टम जैसे शास्त्रीय नृत्यों का भी प्रदर्शन होता है ओणम का यह आखिरी दिन न केवल दावतों और नृत्यों का है, बल्कि यह परिवार और दोस्तों के साथ बिताने, पुराने गिले-शिकवे भुलाने और आपसी प्रेम बढ़ाने का भी दिन है. यह पर्व केरल की संस्कृति, परंपरा और प्रकृति के साथ उसके गहरे जुड़ाव को दर्शाता है.
ओणम का महत्व और इतिहास
ओणम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी पौराणिक कहानी है. यह पर्व असुर राजा महाबलि के पृथ्वी पर आगमन का प्रतीक है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाबलि एक बहुत ही दयालु और पराक्रमी राजा थे, जिनके शासनकाल में प्रजा बहुत खुश थी. उनका शासन इतना अच्छा था कि देवता भी उनसे ईर्ष्या करते थे. महाबलि ने एक यज्ञ किया था, जिसके बाद उन्होंने घोषणा की कि वे किसी को भी कुछ भी मांगने पर मना नहीं करेंगे. तब भगवान विष्णु ने वामन (बौने ब्राह्मण) का रूप धारण किया और महाबलि के पास तीन पग भूमि दान में मांगी.
वामन ने पहले पग में पूरी पृथ्वी, दूसरे में पूरा आकाश नाप लिया. अब तीसरे पग के लिए कोई जगह नहीं बची. राजा महाबलि ने अपना वचन निभाने के लिए वामन से कहा कि वे तीसरा पग उनके सिर पर रख दें. जैसे ही वामन ने तीसरा पग रखा, राजा महाबलि पाताल लोक चले गए. हालांकि, भगवान विष्णु उनकी उदारता और प्रजा प्रेम से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने महाबलि को साल में एक बार अपनी प्रजा से मिलने के लिए पृथ्वी पर आने का वरदान दिया. यही वजह है कि हर साल ओणम पर राजा महाबलि के स्वागत में यह पर्व मनाया जाता है.













