Anant Chaturdashi Katha : हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर अनंत चतुर्दशी का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन गणेश भगवान की मूर्ति का विसर्जन करने के साथ-साथ व्रत रखने का भी खास महत्व होता है। अनंत चतुर्दशी पर भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा होती है और विधि-विधान से व्रत रखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से जातक के जीवन में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है। वहीं, व्रत कथा का पाठ करना भी बेहद महत्वपूर्ण होता है। इससे आपकी हर मनोकामना पूर्ण हो सकती है। ऐसे में आइए विस्तार से जानें अनंत चतुर्दशी व्रत कथा …
अनंत चतुर्दशी 2025 व्रत कथा
महाराज युधिष्ठिर ने एक बार राजसूय यज्ञ किया था और यज्ञ मंडप का निर्माण बहुत ही सुंदर और अद्भुत तरीके से कराया गया था। यज्ञ के मंडप में जल की जगह स्थल तो स्थल की जगह जल की भ्रांति होती थी। इसी के चलते दुर्योधन एक स्थल को देखकर जल कुण्ड में जाकर गिर गए। जब द्रौपदी ने यह देखा तो उनका उपहास करते हुए बोलीं कि अंधे की संतान भी अंधी होती है। इस कटुवचन को सुनकर दुर्योधन बहुत आहत हो गए और अपने अपमान का बदला लेने हेतु उसने युधिष्ठिर को द्युत यानी जुआ खेलने के लिए बुला लिया। वहां, छल से जीत हासिल करके पांडवों को 12 वर्ष का वनवास दे दिया।
वन में रहते वक्त उन्हें अनेक प्रकार के कष्टों को सहना पड़ा। फिर एक दिन वन में भगवान कृष्ण युधिष्ठिर से मिलने के लिए गए। तब युधिष्ठिर ने उन्हें अपना सब हाल विस्तार से बताया और इस विपदा से निकलने का मार्ग दिखाने के लिए कहा। इसके उत्तर में भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को अनंत चतुर्दशी का व्रत करने को कहा। उन्होंने व्रत के बारे में बताया कि इसे करने से खोया हुआ राज्य भी प्राप्त हो जाएगा। वार्तालाप करने के बाद कृष्णजी युधिष्ठिर को एक कथा सुनाने लगते हैं। उन्होंने कहा, प्राचीन काल में एक ब्राह्मण था और उसकी एक सुशीला नामक कन्या थी। जब कन्या बड़ी हो गई तो ब्राह्मण ने कौण्डिन्य ऋषि से उसका विवाह कर दिया। विवाह संपन्न होने के बाद कौण्डिन्य ऋषि अपने आश्रम की तरफ चल लगे। मार्ग में रात होने पर वह नदी किनारे आराम करने रहे थे। तभी सुशीला के पूछने पर उन्होंने अनंत व्रत का महत्व बताया। इसके बाद, सुशीला ने उसी स्थान पर व्रत का अनुष्ठान कर 14 गांठों वाला डोरा अपने हाथ में बांध लिया। इसके बाद, वह अपने पति के पास आ गई।
कौण्डिनय ऋषि ने सुशीला के हाथ में डोरे बंधे देखा तो उसके बारे में पूछने लगे। तभी सुशीला ने उन्हें सारी बात बता दी। लेकिन कौण्डिनय ऋषि सुशीला की बात सुनकर बिल्कुल भी प्रसन्न नहीं हुए और उसके हाथ में बंधे डोर को भी आग लगाकर जला दिया। जिससे अनंत भगवान का अपमान हुआ और इसके परिणामस्वरूप कौण्डिनय ऋषि की सारी संपत्ति नष्ट हो गई। सुशीला ने इसके पीछे का कारण डोर का आग लगाना बताया। इसके बाद, ऋषि पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए अनंत भगवान की खोज में वन की ओर निकल गए। वहां भटकते-भटकते वह निराश होकर गिर पड़े और बेहोश हो गए।
भगवान अनंत ने उन्हें तब दर्शन दिया और कहा कि मेरे अपमान के कारण ही तुम्हारी यह दशा हुई और सारी विपत्तियां आई। लेकिन अब तुम्हारे पश्चाताप से मैं प्रसन्न हूं और अब तुम अपने आश्रम में वापस जाओ और 14 साल तक मेरे इस व्रत को विधि-विधान से करो। ऐसा करने से तुम्हारे समस्त कष्ट दूर हो जाएंगे। इसके बाद कौण्डिनय ऋषि ने वैसा ही किया जैसा भगवान ने कहा था। इससे उनके सभी कष्ट दूर हो गए और उन्हें मोक्ष भी प्राप्त हो गया। युधिष्ठिर ने भी श्रीकृष्ण की आज्ञा से अनंत भगवान का व्रत किया। जिससे महाभारत के युद्ध में पांडवों को जीत प्राप्त हुई।













