Hartalika Teej Vrat Katha in Hindi: हरतालिका तीज का व्रत सुहागन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं दोनों ही रखती है। सुहागन महिलाएं अपनी सुहाग की रक्षा के लिए जबकि कुंवारी कन्याएं मनचाहे वर की कामना के लिए रखती हैं। हरतालिका तीज का व्रत की महिला पुराणों में भी बताई गई है। इस व्रत की महिला भगवान शिव ने खुद माता पार्वती से बताई थी। हरतालिका तीज का व्रत करने वाली महिलाओं को इस कथा का पाठ करना बेहद जरुरी है। यहां पढ़ें हरतालिका तीज व्रत की संपूर्ण कथा।
जिसके दिव्य केशों पर मंदार (आक) के पुष्पों की माला शोभा देती है और जिन भगवान शंकर के मस्तक पर चन्द्र और कण्ठ में मुण्डों की माला पड़ी हुई है, जो माता पार्वती दिव्य वस्त्रों से तथा भगवान शंकर दिगम्बर वेष धारण किए हैं, उन दोनों भवानी-शंकर को नमस्कार करता हूं।
कैलाश पर्वत के सुंदर शिखर पर विराजमान भगवान शिव से माता पार्वती जी ने पूछा -हे महेश्वर ! मुझ से आप वह गुप्त से गुप्त बात कहिए जो सबके लिए सब धर्मों से भी सरल और महान फल देने वाली हो। हे नाथ! अगर आप भली-भांति प्रसन्न हैं तो आप उसे मेरे सम्मुख प्रकट करें। हे जगत नाथ! आप आदि, मध्य और अंत रहित हैं, आपकी माया का कोई पार नहीं है। आपको मैंने किस भांति प्राप्त किया है? कौन से व्रत, तप या दान के पुण्य फल से आप मुझको वर रूप में मिले ? कृपा करके उस व्रत जप तप का विवरण आप विस्तारपूर्वक करें।
महादेव बोले-हे देवी! यह सुन, मैं आपके सम्मुख उस व्रत को कहता हूं, जो परम गुप्त है, जैसे तारागणों में चंद्रमा और ग्रहों से सूर्य, वर्णों में ब्राह्मण, देवताओं में गंगा, पुराणों में महाभारत, वेदों में साम और इंद्रियों में मन श्रेष्ठ है। वैसे ही पुराण और वेद सबमें इसका वर्णन आया है। जिसके प्रभाव से तुम्हे मेरा आधा आसन प्राप्त हुआ है। हे प्रिये ! उसी का मैं तुमसे वर्णन करता हूं, सुनो-भाद्रपद (भादों) मास के शुक्ल पक्ष की हस्त नक्षत्र संयुक्त तृतीया (तीज) के दिन इस व्रत का अनुष्ठान मात्र करने से सब पापों का नाश हो जाता है। तुमने पहले हिमालय पर्वत पर इस महान व्रत को किया था, जो मैं तुम्हें सुनाता हूं। पार्वती जी बोली- हे प्रभु इस व्रत को मैंने किस लिए किया था, यह मुझे सुनने की इच्छा है सो, कृपा करके कहिये।
शंकर जी बोले- आर्यावर्त में हिमालय नामक एक महान पर्वत है, जहां अनेक प्रकार की भूमि अनेक प्रकार के वृक्ष हैं, यह सदैव बर्फ से ढके हुए तथा गंगा की कल-कल ध्वनि से शब्दायमान रहता है। हे पार्वती जी ! तुमने बाल्यकाल में उसी स्थान पर परम तप किया था और बारह वर्ष तक के महीने में जल में रहकर तथा वैशाख मास में अग्नि में प्रवेश करके तप किया। श्रावण के महीने में बाहर खुले में निवास कर अन्न त्याग कर तप करती रहीं। तुम्हारे उस कष्ट को देखकर तुम्हारे पिता को बड़ी चिंता हुई। वे चिन्तातुर होकर सोचने लगे कि मैं इस कन्या की किससे शादी करूं? इस अवसर पर दैवयोग से ब्रह्मा जी के पुत्र नारद जी वहां आये। देवर्षि नारद ने तुम शैलपुत्री को देखा। तुम्हारे पिता हिमालय ने देवर्षि को अर्घ्य, आसन देकर सम्मान सहित बिठाया और कहा-हे मुनीश्वर! आपने यहां तक आने का कष्ट कैसे किया, कहिये क्या आज्ञा है? नारद जी बोले-हे गिरिराज ! मैं विष्णु भगवान का भेजा हुआ यहां आया हूं। नारद जी ने कहा कि आप अपनी कन्या को उत्तम वर को दान करें। ब्रह्मा, इन्द्र, शिव आदि देवताओं में विष्णु भगवान के समान कोई भी उत्तम नहीं है। इसलिए मेरे मत से आप अपनी कन्या का दान भगवान विष्णु को ही दें। हिमालय बोले-यदि भगवान वासुदेव स्वयं ही कन्या को ग्रहण करना चाहते हैं और इस कार्य के लिए ही आपका आगमन हुआ है तो वह मेरे लिए गौरव की बात है। मैं अवश्य उन्हें ही दूंगा। हिमालय का यह आश्वासन सुनते ही देवर्षि नारद जी बैकुंठ भगवान विष्णु के पास आ पहुंचे।
नारद जी ने हाथ जोड़कर भगवान विष्णु से कहा-प्रभु! आपका विवाह कार्य निश्चित हो गया है। इधर हिमालय ने पार्वती जी से प्रसन्नता पूर्वक कहा- हे पुत्री मैंने तुमको भगवान विष्णु को अर्पण कर दिया है। पिता के इन वाक्यों को सुनते ही पार्वती जी अपनी सहेली के घर गईं और अत्यंत दुखित होकर विलाप करने लगीं। उनको विलाप करते हुए देखकर सखी बोली-हे देवी! तुम किस कारण से दुःख पाती हो, मुझे बताओ। मैं अवश्य ही तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूंगी। पार्वती बोली- हे सखी! मैं श्री महादेव जी को वरण करना चाहती हूं, जबकि पिताजी भगवान विष्णु के साथ मेरा विवाह कराना चाहते हैं। इसलिये मैं निःसन्देह इस शरीर का त्याग करूंगी। पार्वती के इन वचनों को सुनकर सखी ने कहा- हे देवी! जिस वन को तुम्हारे पिताजी ने न देखा हो तुम वहां चली जाओ। अपनी सखी की बात मानकर देवी पार्वती ! ऐसे ही एक वन में चली गईं।महादेव आगे माता पार्वती को बताते हैं कि पिता हिमालय ने तुमको घर पर न पाकर सोचा कि मेरी पुत्री को कोई देव, दानव किन्नर हरण करके ले गया है। मैंने नारद जी को वचन दिया था कि मैं पुत्री का गरुड़ध्वज भगवान के साथ वरण करूंगा। हाय, अब यह कैसे पूरा होगा? ऐसा सोचकर वे बहुत चिंतातुर हो मूर्छित हो गये। तब सब लोग हाहाकार करते हुए दौड़े और मूर्छा दूर होने पर गिरिराज से बोले कि हमें आप अपनी मूर्छा का कारण बताओ। हिमालय बोले- मेरे दुःख का कारण यह है कि मेरी रत्न रूपी कन्या को कोई हरण कर ले गया या सर्प डस गया या किसी सिंह या व्याघ्र ने मार डाला है। वह न जाने कहां चली गई या उसे राक्षस ने मार डाला है।













