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Parivartini Ekadashi 2025: जानिए कब है परिवर्तिनी एकादशी? तारीख, शुभ मुहूर्त और आरती ?

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Parivartini Ekadashi 2025: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व है। आपको बता दें कि हर साल 26 एकादशी पड़ती हैं। वहीं हर महीने 2 एकादशी आती हैं। यहां हम बात करने जा रहे हैं परिवर्तिनी एकादशी के बारे में, जिसका व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि पर परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु योग निद्रा में रहते हुए करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। हालांकि, कुछ स्थानों पर इसे पदमा व जलझूलनी एकादशी भी कहते हैं। इस साल परिवर्तिनी एकादशी का व्रत 3 अक्टूबर को रखा जाएगा। वहीं इस दिन रवि योग भी बन रहा है, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है। साथ ही और भी कई शुभ संयोग बन रहे हैं। आइए जानते हैं तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त…

कब है परिवर्तिनी एकादशी 2025?(Parivartini Ekadashi 2025 Date)
वैदिक पंचांग के अनुसार इस बार 3 सितंबर को सुबह 04 बजकर 54 मिनट पर एकादशी तिथि प्रारंभ हो रही है। इसका अंत 4 सितंबर को सुबह 04 बजकर 22 मिनट पर है। ऐसे में 3 सितंबर को परिवर्तिनी एकादशी का व्रत किया जाएगा।

परिवर्तिनी एकादशी 2025 शुभ मुहूर्त (Parivartini Ekadashi 2025 Muurat)
इस दिन पूजा के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 35 मिनट से लेकर 9 बजकर 10 मिनट तक रहेगा। आप इस अवधि में श्रीहरि की उपासना कर सकते हैं। परिवर्तिनी एकादशी का पारण 4 सितंबर को दोपहर 1 बजकर 36 मिनट से लेकर शाम 4 बजकर 07 मिनट तक होगा।

ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 04:30 बजे से सुबह 05:15 बजे तक रहेगा
रवि योग – सुबह 06 बजे से रात 11:08 बजे तक रहेगा
विजय मुहूर्त – दोपहर 02:27 बजे से दोपहर 03:18 बजे तक रहेगा
अमृत काल – शाम 06:05 बजे से शाम 07:46 बजे तक रहेगा

भगवान विष्णु की आरती
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥

Shivani Verma
Author: Shivani Verma

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