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Premanand Maharaj : क्या राधा रानी को ‘मां’ कहना उचित है? प्रेमानंद महाराज ने दिया जवाब

Premanand Maharaj : श्रीकृष्ण ने क्यों अर्जुन को संन्यास की जगह युद्ध के लिए कहा था? प्रेमानंद महाराज ने दिया उत्तर
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धार्मिक आस्था और भक्ति के संसार में राधा रानी का स्थान अत्यंत विशेष माना जाता है। वे केवल भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय नहीं हैं, बल्कि भक्ति और प्रेम की प्रतीक देवी हैं। उनके बिना कृष्ण भक्ति की कल्पना अधूरी मानी जाती है। भक्ति मार्ग में अनेक भक्त उनसे अपना सम्बंध माता या आराध्या रूप में जोड़ते हैं। लेकिन कई श्रद्धालुओं के मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या राधा रानी को ‘मां’ कहकर संबोधित करना सही है या इससे उनकी महिमा में कोई कमी आ जाती है।

प्रेमानंद महाराज का मार्गदर्शन

हाल ही में आयोजित एक धार्मिक सभा में संत प्रेमानंद महाराज ने इस विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राधा रानी को ‘मां’ कहना बिल्कुल भी अनुचित नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भक्ति का सर्वोच्च आधार भावनाओं की शुद्धता है, न कि केवल शब्द। राधा रानी स्वयं प्रेम और भक्ति की अधिष्ठात्री हैं और भगवान श्रीकृष्ण की आनंदमयी शक्ति की प्रतिरूप हैं। इसलिए भक्त जब उन्हें माता, देवी या राधा रानी कहकर पुकारते हैं, भगवान उस सच्ची श्रद्धा को स्वीकार करते हैं।

भाव ही है सबसे बड़ा महत्व

प्रेमानंद महाराज ने बताया कि भक्ति मार्ग में संबोधन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है भक्त का मन और भावना। यदि कोई भक्त राधा रानी को मां के रूप में मानकर प्रेमपूर्वक पूजा करता है, तो यह भक्ति उसी रूप में पवित्र और स्वीकार्य है। राधा रानी करुणा, दया और अनंत प्रेम की मूर्ति हैं, इसलिए उनका कोई भी संबोधन उनके महत्त्व को कम नहीं कर सकता।

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राधा रानी और भक्तों का अनमोल संबंध

संत ने यह भी बताया कि राधा रानी अपने भक्तों के प्रति अत्यंत दयालु हैं। उनकी कृपा हर भक्त पर समान रूप से बरसती है। भक्ति में राधा रानी को माता कहना, देवी कहना या आराध्या कहना—सभी स्वीकार्य है। इससे उनका व्यक्तित्व छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि भक्त और देवी के बीच का आत्मीय संबंध और गहरा होता है।

अंततः प्रेमानंद महाराज का संदेश यह है कि राधा रानी की महिमा और उनके प्रति भक्ति को शब्दों या संबोधन से सीमित नहीं किया जा सकता। भक्ति का मूल आधार है श्रद्धा और प्रेम, और यही सबसे महत्वपूर्ण है। इसलिए कोई भी भक्त उन्हें ‘मां’, ‘देवी’ या ‘आराध्या’ कहकर पुकार सकता है। इससे उनके प्रति भक्ति और श्रद्धा की गहराई और भी बढ़ती है।राधा रानी को समझने और भक्ति में उनका सही स्थान देने का यही सबसे सटीक मार्ग है। संत ने भक्तों को यह भी प्रेरित किया कि भक्ति केवल परंपरा या शब्दों तक सीमित न रहे, बल्कि भाव और सच्चाई से भरी हो। यही राधा रानी की भक्ति का सार है।

Shivani Verma
Author: Shivani Verma

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