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Premanand Maharaj: ना पैसा, ना सफलता दे पा रही खुशी? प्रेमानंद महाराज ने खोला सच्चे आनंद का रहस्य

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Premanand Maharaj ke Pravachan: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर इंसान सफलता के पीछे भाग रहा है. हमें लगता है कि एक अच्छी नौकरी, ढेर सारा पैसा और आलीशान घर मिल जाएगा तो हम खुश हो जाएंगे. लेकिन विडंबना देखिए, जिनके पास ये सब है, वे भी मानसिक शांति के लिए भटक रहे हैं. आखिर असली खुशी है कहां? सोशल मीडिया पर अपने सत्संग के माध्यम से लाखों लोगों का मार्गदर्शन करने वाले प्रेमानंद महाराज ने हाल ही में एक भक्त के इसी सवाल का ऐसा उत्तर दिया, जो आपकी सोच बदल सकता है.

भक्त का सवाल: सफलता और पैसा होने के बाद भी क्यों है बेचैनी?

एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज के सामने अपनी व्यथा रखते हुए पूछा, महाराज जी, मुझे खुशी नहीं मिलती, मैं परेशान हो चुका हूँ. सफलता का असली तात्पर्य क्या है? क्या पाने से मन शांत होगा?”

सफलता और खुशी का भ्रम: महाराज जी का कटाक्ष

प्रेमानंद महाराज ने बहुत ही सरल शब्दों में इस भ्रम को तोड़ा. उन्होंने कहा कि आज के समाज में सफलता का पैमाना गलत तय कर दिया गया है.

भ्रम: लोग समझते हैं कि पद, प्रतिष्ठा और बैंक बैलेंस ही खुशी का आधार है.

हकीकत: प्रेमानंद महाराज ने कहा, जिनके पास अपार धन है, जरा उनसे पूछकर देखिए क्या वे वाकई खुश हैं? आप जिस वस्तु या वैभव को पाने के लिए तड़प रहे हैं, वह किसी और के पास पहले से है, लेकिन वह व्यक्ति भी दुखी और अशांत है.” इससे स्पष्ट है कि बाहरी वस्तुएं मन को तृप्ति नहीं दे सकतीं.

सच्ची खुशी का पता

महाराज जी ने समझाया कि खुशी वैभव, संपत्ति या सुंदर परिवार में नहीं, बल्कि परमात्मा में है. उन्होंने शास्त्र का प्रमाण देते हुए कहा, ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा. जो व्यक्ति अपने मन को भगवान से जोड़ लेता है, वही वास्तव में आनंदित रह सकता है. उन्होंने स्पष्ट किया कि संसार की चीजें क्षणिक सुख देती हैं, जबकि भगवान से मिलने वाला आनंद शाश्वत है.

नकारात्मकता का त्याग करें: जो पास है उसे पहचानें

प्रेमानंद महाराज ने भक्त को आईना दिखाते हुए कहा कि दुःख का एक बड़ा कारण हमारी नकारात्मक सोच है. आपके पास स्वस्थ शरीर है, आंख-कान ठीक काम कर रहे हैं, दो वक्त का भोजन मिल रहा है—इतना सब होने के बाद भी अगर आप खुश नहीं हैं, तो यह केवल आपकी नकारात्मकता है. उन्होंने सीख दी कि ईश्वर ने आपको जो दिया है, पहले उसमें खुश रहना सीखें. कृतज्ञता ही प्रसन्नता की पहली सीढ़ी है.

Madhumita Verma
Author: Madhumita Verma

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