हिंदू धर्म में तुलसी विवाह का विशेष महत्व है। यह पर्व हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है, जिसे देवउठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु चार महीने की योग निद्रा से जागते हैं और सृष्टि के कार्यों का संचालन पुनः आरंभ करते हैं। इस दिन तुलसी माता का विवाह भगवान शालिग्राम (विष्णु जी के स्वरूप) से किया जाता है। यह विवाह धार्मिक आस्था, भक्ति और शुभता का प्रतीक माना जाता है।
तुलसी विवाह की तिथि और मुहूर्त
इस वर्ष तुलसी विवाह 11 नवंबर 2025, मंगलवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 10 नवंबर की रात 10 बजकर 20 मिनट पर प्रारंभ होकर 11 नवंबर की रात 8 बजकर 55 मिनट पर समाप्त होगी। विवाह का शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक रहेगा। इस समय के दौरान तुलसी विवाह करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
पूजा और अनुष्ठान की परंपरा
तुलसी विवाह के दिन घरों और मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है। तुलसी के पौधे को लाल चुनरी, गहनों और फूलों से सजाया जाता है। वहीं भगवान शालिग्राम या विष्णु की मूर्ति को वर के रूप में तैयार किया जाता है। विवाह की सभी परंपरागत रस्में निभाई जाती हैं—जैसे हल्दी, चावल, माला पहनाना और फेरे लेना। अंत में आरती कर प्रसाद वितरण किया जाता है। श्रद्धालु इस अवसर पर व्रत रखकर दिनभर पूजा-अर्चना करते हैं।

धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी देवी का विवाह भगवान विष्णु से हुआ था। इस विवाह को प्रतीकात्मक रूप से हर वर्ष मनाया जाता है। तुलसी विवाह को घर में सौभाग्य, समृद्धि और वैवाहिक सुख का प्रतीक माना गया है। कहा जाता है कि इस दिन विवाह कराने या उसका साक्षी बनने वाले को वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
आस्था और परंपरा का संगम
देवउठनी एकादशी से ही विवाह और मांगलिक कार्यों का शुभ समय प्रारंभ होता है। तुलसी विवाह न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह प्रकृति और मानव के आध्यात्मिक संबंध का भी प्रतीक है। इस दिन भक्तजन श्रद्धा, भक्ति और प्रेम के साथ तुलसी माता का विवाह संपन्न कर अपने जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।













