ब्यूरोचीफ- शिवदत्त गोस्वामी, आगरा
Bateshwar Dham: उत्तर भारत की पौराणिक और धर्म-संस्कृति की नगरी बटेश्वर का द्वापर युग से अत्यंत गहरा संबंध रहा है। इतिहास और पौराणिक मान्यताएं इस बात की साक्षी हैं कि यदि देवकी की विदाई के समय वह आकाशवाणी न हुई होती, तो भगवान श्री कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा का कारागार नहीं, बल्कि बटेश्वर (शौरीपुर) होती।
भगवान कृष्ण के पितामह महाराजा शूरसैन की राजधानी शौरीपुर (बटेश्वर) ही थी, द्वापर युग में वसुदेव की बारात देवकी से विवाह के लिए इसी शौरीपुर से मथुरा के लिए रवाना हुई थी। लेकिन विदाई के समय अचानक आसमान से हुई आकाशवाणी के बाद कंस ने देवकी और वसुदेव को बंदी बना लिया। इन्हीं आपातकालीन परिस्थितियों के कारण श्री कृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ। यदि वह घटनाक्रम न घटता, तो वसुदेव अपनी देवकी को लेकर शौरीपुर (बटेश्वर )लौटते और कान्हा की बाल लीलाओं का पहला केंद्र यही पावन भूमि बनती।
कंस वध के बाद शौरीपुर में बिताए छह महीने
पुराणों के अनुसार, कंस का वध करने के पश्चात भगवान कृष्ण और बलराम करीब छह महीने तक शौरीपुर में रहे थे। इस क्षेत्र से उनके गहरे जुड़ाव के पुख्ता प्रमाण आज भी मौजूद हैं।
बांके बिहारी व गोकुलनाथ मंदिर: बटेश्वर में आज भी स्थापित ये प्राचीन मंदिर कृष्ण की मौजूदगी की गवाही देते हैं।
हलधर का बाग: शौरीपुर (बटेश्वर )में जिस स्थान पर कान्हा और बलराम ने स्वयं हल चलाया था, वह जगह आज भी ‘हला का बाग’ (हलधर का बाग) के नाम से प्रसिद्ध है।
कृष्ण के पुत्र और पौत्र के नाम से आबाद हैं मुहल्ले
आगरा जिले की बाह तहसील में स्थित भगवान कृष्ण के वंशजों की स्मृतियां आज भी जीवित हैं। कान्हा के पुत्र प्रद्युम्न के नाम पर ‘पदमन खेड़ा’ और पौत्र अनिरुद्ध के नाम पर ‘ओंध खेड़ा’ मुहल्ले आज भी बसे हुए हैं।जिनको पूरन खेड़ा के नाम से पुकारते है l
यमुना किनारे आज भी साक्षी है ‘कंस करार’
बटेश्वर में यमुना किनारे मिट्टी का एक विशाल टीला स्थित है, जिसे ‘कंस करार’ कहा जाता है। कथाओं के अनुसार, कंस के वध के बाद उसे यमुना मे प्रवाहित किया गया जो बहता हुआ जिस (करार )टीले से टकराया था।उसे आज भी कंस करारा के नाम से जाना जाता है
द्वापर युग की इन ऐतिहासिक और पौराणिक धरोहरों को समेटे बटेश्वर आज भी भगवान श्री कृष्ण के आगमन और उनकी अमर गाथाओं का जीवंत प्रमाण बना हुआ है।
……समाप्त……












