वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज को आज कौन नहीं जानता है. उनके एकांतिक प्रवचन सुनने के लिए लोगों की लाइन लगी रहती है. इस बीच दिल्ली के जीबी रोड रेड लाइट एरिया से सेक्स वर्कर्स को बचाने वाली एक शख्सियत महाराज जी के श्रीहित राधा केलि कुंज आश्रम में पहुंचीं, जिन्होंने महाराज जी के न सिर्फ एकांतिक प्रवचन सुने बल्कि अपने सवाल का जवाब भी जानना चाहा. प्रेमानंद महाराज ने सवाल सुनने के बाद उनकी सबसे पहले जमकर तारीफ की और इस तरह के काम को बेहद पुनीत बताया. साथ ही साथ उन्हें एक गुरुमंत्र के तौर पर सलाह भी दी.

महिला ने महाराज जी से पूछा, ‘मैं दिल्ली के रेड लाइट एरिया में कोठों के अंदर जाकर फंसी औरतों को निकालने और उनके बच्चों को नया जीवन देने का काम करती हूं, पर इस काम में बहुत चुनौतियां हैं और एक विश्वास भी है कि मुझे ये काम दिया गया है. जब-जब श्रद्धा कम होती है और चुनौती बड़ी लगती है तब-तब क्या करें?’
सवाल सुनने के बाद प्रेमानंद महाराज ने कहा, ‘ये बहुत प्रशंसनीय कार्य है. जिनका जीवन गंदगी में ढकेल दिया गया है, उनको गंदे आचरणों से मुक्त करना, उनको एक नया जीवन देना यह बहुत प्रशंसनीय कार्य है, लेकिन आत्मविश्वास टूटना नहीं चाहिए बल्कि और बढ़ना चाहिए. एक जीव को अगर हमने डूबने से बचा लिया तो बहुत बड़ा कार्य कर रहे हैं. स्वयं के लिए भजन करना, अपना कल्याण करना एक अलग बात होती है, लेकिन दूसरे के कल्याण की बात सोचना एक खास बात होती है. “परहित सरिस धरम नहिं भाई”. कई परिस्थतियों में बच्चियां इस परिस्थित में फंस जाती हैं. आप ये प्रशंसनीय कार्य कीजिए और राधा नाम का जप कीजिए ताकि आपका आत्मबल कभी टूटे ना. आप लड़ती रहिए. आपकी रक्षा में भगवान हैं.’

कौन हैं गीतांजलि बब्बर?
दरअसल, प्रेमानंद महाराज ने जिन शख्सयित को सलाह दी है वे एक जानी-मानी सेक्स वर्कर एक्टिविस्ट हैं. इनका नाम गीतांजलि बब्बर है. वह एक नॉन-प्रॉफिट संस्था ‘कट-कथा’ की फाउंडर और डायरेक्टर हैं, जो दिल्ली के सबसे बड़े रेड लाइट एरिया जी.बी. रोड की वेश्यालयों में सेक्स वर्कर्स को सशक्त बनाने और आजाद कराने का काम करती हैं. उन्होंने महज 22 साल की उम्र में जीबी रोड की यौनकर्मियों की मदद करना शुरू की थी. साथ ही राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) के साथ काम किया है.

नाको के साथ काम को लेकर उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि वह वहां यह सोचकर गई थीं कि एचआईवी परीक्षण और एड्स की रोकथाम के बारे में जागरूकता फैलाएंगी, जैसा कि हम सभी मानते हैं कि इससे उन्हें मदद मिलेगी, लेकिन उन्हें एहसास हुआ कि इस काम के अलावा भी एक जीवन है. उन्होंने कहा, ‘वेश्यालय में अपने पहले दिन मैं एक भी सवाल नहीं पूछ सकी, मेरा शरीर और दिमाग सुन्न हो गया था. मैंने अपनी उम्र की, बल्कि मुझसे भी छोटी लड़कियों को ऐसी जिंदगी में फंसा हुआ देखा जिसे उन्होंने कभी नहीं चुना था, जबकि हम बाहर बेखबर बैठे रहे. मैं वहां बदलाव लाने वाली बनकर गई थी, लेकिन उनकी दुनिया ने मुझे बदल दिया. इसने मुझे एहसास दिलाया कि मुझे इस धंधे के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा ताकि मैं एक बड़ा बदलाव ला सकूं. 14 साल बाद भी मैं हर दिन बदल रही हूं.’













