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Premanand Maharaj : श्रीकृष्ण ने क्यों अर्जुन को संन्यास की जगह युद्ध के लिए कहा था? प्रेमानंद महाराज ने दिया उत्तर

Premanand Maharaj : श्रीकृष्ण ने क्यों अर्जुन को संन्यास की जगह युद्ध के लिए कहा था? प्रेमानंद महाराज ने दिया उत्तर
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 Premanand Maharaj : महाभारत का युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन का मन भारी हो गया था। सामने अपने गुरु द्रोणाचार्य, अपने पितामह भीष्म और अपने ही भाईबंधु खड़े थे। अर्जुन का धनुष नीचे झुक गया, और उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा — “हे माधव! मैं इस युद्ध को नहीं लड़ सकता। अपने ही प्रियजनों का संहार कैसे करूं?”उसी क्षण भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को वह दिव्य ज्ञान दिया, जिसे आज हम भगवद्गीता के रूप में जानते हैं। यही वह संवाद था जिसने अर्जुन को संन्यास की भावना से निकालकर धर्म के लिए युद्ध करने की प्रेरणा दी।

प्रेमानंद महाराज ने किया गीता के रहस्य का उद्घाटन

प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने अपने प्रवचन में बताया कि श्रीकृष्ण का संदेश सिर्फ अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए था। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह समझाया कि जीवन में कर्तव्य से पलायन ही सबसे बड़ा अधर्म है।महाराज ने कहा — “अर्जुन संन्यास लेना चाहते थे, लेकिन भगवान ने उन्हें बताया कि सच्चा संन्यासी वह नहीं जो युद्ध से भाग जाए, बल्कि वह है जो अपने धर्म के लिए, सत्य के लिए, और न्याय के लिए कर्म करे।”

कर्मयोग का सन्देश — भागना नहीं, निभाना है धर्म

Premanand Maharaj ने गीता के श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा —“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”अर्थात, मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता करने में नहीं।भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि यदि तुम रणभूमि से भागोगे, तो यह कायरता होगी। संसार में किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा धर्म है — अपने कर्तव्य को निभाना।श्रीकृष्ण का यही उपदेश कर्मयोग कहलाता है। यह सिखाता है कि त्याग बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक होना चाहिए। मोह, लालच और भय से ऊपर उठकर जब कोई व्यक्ति अपने धर्म का पालन करता है, तभी वह सच्चा संन्यासी कहलाता है।

प्रेमानंद महाराज का सन्देश — गीता आज भी उतनी ही प्रासंगिक

महाराज ने कहा कि आज के युग में लोग कठिनाइयों से डरकर अपने कर्तव्यों से भागना चाहते हैं, लेकिन गीता सिखाती है कि जीवन संघर्षों से नहीं, बल्कि कर्म से चलता है।उन्होंने कहा — “संन्यास का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि अपनी आसक्तियों को त्यागना है। जो अपने मन, विचार और कर्म को भगवान के प्रति समर्पित कर देता है, वही सच्चा योगी है।”

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