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Shardiya Navratri 2026: महाराष्ट्र के पांडे गांव में अनोखे ‘खड़े नवरात्र’, 9 दिन तक खड़े रहकर तपस्या कर रहे 400 श्रद्धालु !

Shardiya Navratri 2026: महाराष्ट्र के पांडे गांव में अनोखे ‘खड़े नवरात्र’, 9 दिन तक खड़े रहकर तपस्या कर रहे 400 श्रद्धालु !
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Shardiya Navratri 2026: महाराष्ट्र के सतारा जिले के वाई तालुका स्थित पांडे गांव में नवरात्र के दौरान एक अनोखी धार्मिक परंपरा निभाई जा रही है। यहां भगवान काल भैरवनाथ के प्रति आस्था रखने वाले करीब 350 से 400 श्रद्धालु नौ दिनों तक खड़े रहकर कठिन व्रत कर रहे हैं। इस परंपरा को ‘खड़े रहकर किए जाने वाले नवरात्र’ के नाम से जाना जाता है। खास बात यह है कि करीब 350 साल पुरानी इस परंपरा में धार्मिक आस्था के साथ हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक सद्भाव की झलक भी देखने को मिल रही है।

इस वर्ष श्रद्धालु महाराष्ट्र में सूखे के संकट से राहत, अच्छी फसल और किसानों के जीवन में खुशहाली की कामना कर रहे हैं। व्रतधारी भगवान काल भैरवनाथ और माता जोगेश्वरी के चरणों में प्रार्थना कर रहे हैं।

नौ दिन तक नंगे पैर, जमीन पर बैठने और सोने की मनाही

इस अनोखे व्रत में शामिल श्रद्धालुओं को नौ दिनों तक कई कठिन नियमों का पालन करना पड़ता है। व्रतधारी नंगे पैर रहते हैं और जमीन पर बैठने या सोने से परहेज करते हैं। इसके अलावा तेल, नमक और मिर्च-मसालों का भी त्याग करते हैं।

श्रद्धालुओं के शरीर पर सफेद वस्त्र, हाथों में सहारे के लिए छड़ी और मन में भगवान काल भैरवनाथ के प्रति अटूट आस्था दिखाई देती है। नौ दिनों तक खड़े रहकर व्रत का संकल्प निभाना आसान नहीं होता, लेकिन भक्त पूरी श्रद्धा के साथ इस परंपरा का पालन करते हैं।

रात में आराम के लिए मंदिर परिसर में रस्सियों के झूले बांधे जाते हैं। व्रतधारी नींद आने पर इन झूलों का सहारा लेकर विश्राम करते हैं, ताकि जमीन पर न सोने का उनका संकल्प बना रहे।

हिंदू-मुस्लिम एकता की खूबसूरत मिसाल

गांव के इस धार्मिक उत्सव की खासियत केवल कठिन तपस्या तक सीमित नहीं है। यहां हिंदू समुदाय के लोगों के साथ मुस्लिम समुदाय के लोग भी उत्सव में भाग लेते हैं। इस तरह सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा सामाजिक सद्भाव और आपसी भाईचारे का संदेश भी देती है।

रात के समय भजन, कीर्तन, गोंधल और वाघ्या-मुरली के पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों से पूरा गांव भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है। अष्टमी की रात जागरण होता है, जबकि नवमी के दिन भगवान का कौल लिया जाता है। इसके बाद विजयादशमी पर सीमोल्लंघन की परंपरा निभाई जाती है।

विजयादशमी पर निभाई जाती है ‘सोना लूटने’ की परंपरा

इस उत्सव का समापन विजयादशमी के दिन एक खास परंपरा के साथ होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान का कौल लेकर सीमोल्लंघन की दिशा तय की जाती है। इसके बाद ग्रामीण गांव की सीमा पर पहुंचते हैं और एक-दूसरे को आपटे के पत्ते देते हैं।

इन पत्तों को सोने का प्रतीक मानकर ‘सोना लूटने’ की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद व्रतधारी अपना उपवास खोलते हैं और नौ दिनों तक चलने वाली तपस्या का समापन होता है।

पीढ़ियों से कायम है आस्था और परंपरा

ग्रामीणों के अनुसार, करीब 350 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। समय के साथ पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन भगवान काल भैरवनाथ के प्रति लोगों की आस्था बनी हुई है।

श्रद्धालुओं का मानना है कि भगवान की कृपा उनके परिवारों पर बनी रहती है। इसी विश्वास के साथ वे हर वर्ष इस कठिन व्रत में शामिल होते हैं।

पांडे गांव का यह आयोजन धार्मिक आस्था, स्थानीय संस्कृति और सामाजिक एकता का अनूठा संगम है। नौ दिनों तक चलने वाली यह परंपरा न केवल श्रद्धालुओं के संकल्प और विश्वास को दर्शाती है, बल्कि आपसी सद्भाव के संदेश को भी मजबूत करती है।

…….समाप्त……

Shweta Yadav
Author: Shweta Yadav

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